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प्रश्न 3- विशाल गौतम जी अलीगढ़ से, संगीता मित्तल जी अम्बाला से, आप दोनो के एक जैसे प्रश्न थे। राधाबल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी मन के भीतर विराजमान गुरूतत्व की आज्ञा को कैसे पहचाने? कभी – कभी मन ये प्रेरणा करता है कि इसको भोग लें।

उत्तर – ये हमें समझना होगा कि आज्ञा मन की नही होती , क्रिया करने का संकल्प मन बनाता है, आज्ञा बुद्धी की होती है। अन्तः करण चतुष्टय है। क्रिया का निश्चय करना , या ना करना ये बुद्धी का कार्य है। संकल्प करना , विकल्प करना यह मन का कार्य है। क्रिया का चिन्तन करना यह चित्त का कार्य है, और उसे स्वीकार कर लेना । मैने किया है, मै भोगुंगा , मैने किया है, मै करूंगा , यह अहंकार का कार्य है। चार धर्म अन्तः करण में होते है। उसे अन्तः करण चतुष्टय कहते हैं। तो निर्णय मन का नही होता , निर्णय बुद्धी का होता है। बुद्धी दो प्रकार की होती है, एक सुमति और दुसरी कुमति। कुमति बुद्धी जो गलत भों गों में दस्तकत कर देती है। मन उसका संकल्प बना लेता है। सुमति बुद्धी जो प्रमाणित करेगी मन की मांग को । अच्छा ये भोग नहीं , नहीं सन्तों ने मना किया है, शास्त्रो ने मना किया है। ऐ मन तु लाख कोशिश कर ऐसा नही होगा । तो वो बच जाएगा । जो गुरू तत्व का प्रेरणात्मक स्त्रोत है वो सुमति में होता है। जो आसुरी प्रवृत्ती की प्ररेणा होती है वो कुमति में होती है। जहाँ सुमति तहँ सम्पत्ति ना ना , जहाँ कुमति तहँ विपत्ति ।। जहाँ कुमति होती है वो गलत आचरण में फसा देती है, गलत लोगों में फसा देती है। जहाँ सुमति होती है वो बचा लेती है। तो सुमति का प्रकाश होता है भगवान का नाम, जप करने से, सत्संग सुनने से। नाम जपने से सुमति जागृत होती है, सत्संग सुनने से सुमति जागृत होती है। नाम जपत आई सब सोई। देव सुबुद्धी कृपा कर मोरी ।। नाम जप चले, और सत्संग सुनो तो सुमति प्रबल हो जाएगी वो कुमति को नष्ट कर देगी । कुमति नष्ट हो जाएगी तो जीवन निहाल हो जाएगा । और अगर कुमति प्रबल हो गयी सुमति को दबा दिया तो फिर दुर्गति हो जाएगी । जो हमसे फिर बड़े – बड़े पाप करवा देती है। जिससे आगे चलकर हमें बहुत विस्तार से भोगना पड़ता है। तो भजन, सत्संग ये सब करें जिससे सुमति प्रबल हो । सुमति प्रबल होगी तो हमें बचा लेगी बुरे आचरण से,  बुरे विचार से। हमें सुमति का कहना मानना चाहिए, कुमति का नहीं। यही पहचान करने के लिए सत्संग होता है।

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