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प्रश्न 2 – महाराज जी । गुरुदेव भगवान के सांनिध्य में रहते हुए आश्रम की सेवाओं में कभी कभी श्री महाराज जी
से प्रार्थना करनी पड़ती है कि ऐसा नहीं ऐसा कर ले । फिर बाद में मन में ग्लानि होती है कि हमने आज्ञा का
उल्लंघन किया ।
उत्तर – हमें लगता है ग्लानी नहीं होनी चाहिए क्योंकि सेवक में वो सामर्थ्य स्वामी देते हैं । जैसे अभी पहले बैच में
हमने उत्तर दिया था , कि उसने प्रश्न किया था कि इनके कितने सौभाग्य है, हम कैसे प्राप्त कर सकते हैं सौभाग्य?
ये सेवक नहीं है, स्वामी बन जाते हैं। सेवक होते हुए भी आप ये नहीं खा सकते महाराज । नहीं यार, श्री जी को
नहीं नहीं। इतना नहीं नहीं कहते, कहते वो पात्र वहाँ से हटा लिया गया। अब आप उसे कह दो कि गुरु अवहेलना
नहीं नहीं गुरु अवहेलना नहीं ये गुरु सेवा है। ये गुरु ने सामर्थ्य दी । आप नहीं समझ रहे हैं। अगर इसको ऐसा –
ऐसा कर लिया जाए तो अच्छा होगा। अब हमारा अस्तित्व अलग नहीं रह गया । मतलब गुरु जी के प्रति हमारे
ऐसे प्रश्न उत्तर हो रहे हैं तो ये उन्हीं का मन है, उन्हीं की बुद्धि है। हाँ हाँ यार तुम ठीक कह रहे हो , तुम ऐसा ही
कर लो तो उसमें थोड़ी ही गुरु की बात को काट दिया । हमे ऐसा समझना पड़ेगा कि सेवा अब आप का अस्तित्व नहीं
रह गया है। अगर अस्तित्व रह गया तो मिटा दीजिये ये मन, ये बुद्धि, ये तन, ये गुरुदेव का है। अगर इससे कुछ
बात हो रही है तो गुरुदेव यहाँ बैठकर बो ल रहे हैं। वहाँ भी गुरुदेव बोल रहे है यहाँ भी बोल रहे हैं, हमें कोई
पश्चाताप नहीं है। श्री रामानंदाचार्यजी जब वो वृद्ध हुए। तो पान की बीड़ी का ठाकुरजी को भोग लगता था तो अब वो
कैसे दांत तो जो उनके शिष्य थे सेवाम्नी जन तो वो ऐसे –ऐसे चबाते। तो वो चबा करके लुग्दी करके
सामने ले जाते और वो पा लेते रोज। अन्य शिष्यों को जब पता चला तो उन्हो ने कहा कि उनका घोर अपराध।
पहले ठाकुरजी का प्रसाद स्वयं चबा कर के फिर गुरुदेव को अपने जूठन देता है नरक मिलेगा इसको । सिद्धांत में
तो ऐसा आता है ना की भाई नरक मिलेगा। तो शिष्यों ने शिकायत की। कि महाराज जी अमुक जो है वो ऐसा है। वो तो जानते ही थे पर उन्हों ने ये दिखाने के लिए। उन्होंने कहा – बुलाओ उसको । बुलाया और कहा क्यों भाई, तुम यह
झूठा चबा कर के हमको क्यों देते हो ? हम तो रोज पा रहे है तुम्हारा । तो उन्होने कहा – प्रभु ये आपकी ओखली है।
झूठा थोड़ी है। आपकी ओखली ऐसे कूट करके आपको देते हैं। गुरू जी ने कहा – हमारी ओखली हमें दे दिजिए।
उन्हो ने कहा ठीक है । अभी लाओ चाकू, यह कह कर वो रसोई से चाकू लाये , और ऐसे करके लगाया चाकु। उन्होंने
कहा – बस बस देखा शिष्यों देखा । हमारा अस्तित्व तो नहीं रहेगा । बस हमारा अस्तित्व नहीं रह गया । अगर
जरूरत पड़े तो हम लड़ेंगे जैसे माँ से लड़ते है ना । महाराज जी नहीं नहीं आपको ये नहीं पाना है क्योंकि आपके
स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं। ये नहीं महाराजी आपको ये पहनना पड़ेगा नहीं नहीं हम नहीं पहनेंगे हमने कभी नहीं
पहना । हाँ महाराज जी आपने कभी नहीं पहना , पर आज आपको पहनना पड़ेगा । आपको जरूरत है स्वेटर की ।
क्योंकि अपना अस्तित्व स्वामी के चरणों में समर्पित हो चुका है। सेवक वही जिसका अपनत्व समर्पित
हो चुका है। अब हम उनसे लड़ सकते हैं, अब उनसे बात कर सकते है। हाँ जो स्याने है वो आज्ञा का पालन करें।
हम तो बच्चे हैं आपके। हम आपके बच्चे, बच्चे जो हैं, बिगड़ेल होते हैं। हमें लगता है बच्चा बंन करके जो प्यार
गुरुदेव का मिलता है ना वो ज्ञानी – विज्ञानी बन करके नहीं मिलता है। हम उनके चरणों में ऐसे है कि हम नहीं रह
सकते जो तुम्हें गति – दुर्गति वो बात तो तुम जानो । हमारे ईस्ट आप हो , हमारे जीवन आप हों , हम
लड़ेंगे तो आप से, बिगड़ेंगे तो आपसे, बनेंगे तो आपसे, अब हमारा दोष खत्म कोई प्रश्न नहीं जीवन में अब
जब हम अपना अस्तित्व अलग रखेंगे, तब लगेगा कि गुरुदेव को हम ऐसा कैसे बोल सकते हैं।

हमारा अस्तित्व क्या है, हमारे माता – पिता आप हो। त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धु च सखा त्वमेव।। हम लड़ेंगे इनके साथ, खेलेंगे इनके साथ, बनेंगे, बिगड़ेंगे जो भी है हमारे सर्वस्व आप हो । आपसे ही हमारा अस्तित्व है।