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प्रश्न 4- अनुजा अग्रवाल जी। राधे – राधे श्री हरिवंश महाराज जी । महाराज जी जिन शिष्यो कोआपका सानिध्य व सेवा का सौभाग्य मिलाता है वो उनके इसी जन्मों के कर्मों का प्रताप है या उनके पिछले जन्म के कर्मों के फलों का परिणाम होता है?

उत्तर – विवेक के द्वारा विषय त्याग से जो ऊँचाई प्राप्त होती है उसमें भाग्य काम नही करता है। भाग्य में तो केवल शुभ और अशुभ दो ही प्रकार के कर्म के ही फल होते हैं। जो हमारी भाग्य रचना होती है। वो शुभ और अशुभ कर्मों के अनुसार होती है जिनको अवश्य भोगना होता है। अवश्यमेव भोग तभ्यम। कृतम कर्म शुभा शुभम।। ये तो भगवती की कृपा है, जो गुरू का सानिध्य या प्रभु की सेवा का अवसर मिलता है। यह केवल कृपा से प्राप्त होता है। इस कृपा का अधिकारी केवल वही होता है जो सेवा सुख के लिए अपने समस्त सुखों का त्याग कर देता है। जैसे इन सन्तों ने  माता – पिता, शरीर सम्बन्धी सभी भोगो का, मनोरंजन का त्याग करके गुरू आज्ञा पर अपना जीवन समर्पित कर दिया, बलिहार कर दिया तो अब हम इनके अधीन है। वो कहे बैठ जाओ, हम बैठ जायेंगे। वो कहे खड़े हो जाओ हम खड़े हो जायेंगे। स्वामी सेवा के अधीन होता है। सेवक सिर्फ कहने मात्र का रह जाता है वह स्वामि पर अपना अधिकार कर लेता है। हमारे प्रभु विग्रह रूप में विराजमान, शयन कराते हैं तो शयन करते हैं,  उठाते हैं तो उठ जाते हैं, भोग लगाते है तो पाते है। वैसे ही अपने सेवक के अधीन हो जाते हैं। कहने मात्र के स्वामि रह जाते हैं। सेवा में इतना बड़ा बल है कि जैसा सेवक चाहता है, वैसा स्वामि व्यवहार करता है। ये त्रीगुणातीत बात है। ये कर्मों के फल से नहीं , ये अध्यात्म मार्ग है। उन्होंने समस्त त्यागों को स्वीकार करके केवल गुरू सेवा या ईष्ट सेवा पर अपना चित्त दिया है। ये भाग्य बने हैं नये। नये भाग्य का निर्माण हुआ है। ना गृदासी जनम जितायो बलिहारी बलिहारी । हमारी सबही बात सुधारी कृपा करी श्री कुंज बिहारिन कृपा श्री कुंज बिहारी।। ये कृपा से हुआ है। ये हमारा जो जीवन है स्वामिनी जी के शराश्रित जीवन है। आप यहाँ बैठ कर बात संवाद कर रहे हो ये सब श्री जी की कृपा है। यदि उनकी कृपा न हो तो आप यहाँ हमारे सामने भी नही आ सकते क्योंकि हम लोग बिके लोग हैं। हम तो एक पोस्टमैन का कार्य करते हैं इधर की बात उधर, उधर की बात इधर। और भी शिष्य हैं पर वो अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं। उनका एक पर्सनल जीवन है। उनके विषय भोग हैं। हाँ उसमे से एक सम्बन्ध उम्होंने गुरू से भी मान लिया है इसलिए ताकि थोड़ा मंगल हो जाए, थोड़ा कल्याँन हो जाए। लेकिन ये शिष्य इनका कोई नही है इन्होने सर्वस्व त्यागकर केवल गुरू चरणाश्रित हो गये है। जो पवाऐंगी श्री जी, वो पाऐंगे, जो वस्त्र देंगे वो पहनेंगे, जहाँ सुलाऐंगे वहाँ सोऐंगे,  जैसा रखेंगे वैसा रहेंगे। जो आदेश होगा उसी की सीमा के अन्तर्गत रहेंगे। अब इनके कल्याण की जिम्मेदारी इनकी नही रही । इनकी जिम्मेदारी इनके आराध्य देव पर (गुरू) पर चली जाती है। भगवान श्री कृष्ण कहते हैं – जो मुझे जैसे भजता हैं, मैं उसको वैसे भजता हुँ।

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